अशांति के कारण एवं उनके निवारण - Hindi Knowledge

हर व्यक्ति जीवन में सुख शांति चाहता है, लेकिन यह बहुत ही कम लोगों को नसीब हो पाता है इसके कारणों पर विचार कर हम इसका बहुत सीमा तक निदान कर सकते हैं और सुखी एवं संतुष्ट जीवन की ओर कदम बढ़ा सकते हैं| 

अशांति के कारण एवं उनके निवारण - Hindi Knowledge

दूसरों से बड़ी चढ़ी आशा व अपेक्षा दुख का बड़ा कारण बनती है, जब कोई अपनी आशा के अनुकूल नहीं निकलता तो एक झटका सा लगता है मुंह बंद की स्थिति आ जाती है तथा विक्षुब्ध हो जाता है \

समझ आता है कि किसी से भी अत्यधिक आशा अपेक्षा नहीं लगा कर रखनी थी ऐसा प्राय अधिक राग एवं आसक्ति  के कारण होता है |

अनुभवहीनता

हम जल्दबाजी में या जीवन के उथले प्रवाह मे या अनुभवहीनता के कारण किसी व्यक्ति का सम्यक मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं या तो उसे देवता मान बैठते हैं और उसकी पूजा करते हैं |

यह सीधा शैतान मान कर उसके साथ परित्यक सा व्यवहार करते हैं, जबकि हर इंसान इन सब का एक मिश्रण होता है | उसकी अपनी विशेषताएं होती हैं साथ ही अपनी मानवीय सीमाएं भी यह समझ हमें व्यक्ति से अनावश्यक आशा अपेक्षा करने से बचाती है और आगे चलकर दुखी होने से रोकती है |

इंद्रिय सुख

इंद्रिय सुख में जीवन के अर्थ की तलाश भी दुख का एक बड़ा कारण बनती है, इंद्रियों के विषय सुख तो एक ऐसी आग तरह होते हैं कि इसमें जितना ईंधन डालते जाओ वह उतना ही अधिक धधगति जाती है और कभी शांत नहीं होती | 

इसमें अपना सारा तन मन प्राण ईमान, धर्म और जीवन को भी स्वाहा कर दिया जाए तो भी यह तृप्त होने वाली नहीं अंत में बसता है जर्जर रोगी शरीर को कुसंस्कारी बिगड़ैल मन और भारी पश्चाताप से भरा अंतः कारण इसके विपरीत समझदारओं की रीति नीति दूसरी होती है वे संयम एवं सदाचार पूर्ण जीवन जीते हैं | 

संतुलित दिनचर्या

एक अनुशासित एवं संतुलित दिनचर्या का अनुसरण करते हैं और परिणाम स्वरूप एक स्वस्थ निरोगी एवं सुखी जीवन जीते हैं शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्म संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करते हैं |

धन को ही सबकुछ मान बैठने वाले भी कभी सुख चैन से नहीं बैठ पाते हैं एक तो इसको कमाने में ही वे अपने जीवन का बहुत कुछ दांव पर लगा बैठे होते हैं जो उनके जीवन को असंतुलन प्रदान करता है और इसीलिए उनका मन हमेशा ही तनाव की स्थिति को लिए होता है |

धन अर्जन कर भी लिया तो फिर इसकी साज, संभाल और वृद्धि को लेकर चिंता सताती रहती है | परिवार में जब भी अपने बच्चों को समय ही नहीं दे पाते तो ऐसे में उन्हें संस्कारों के रोपण का हिस्सा अपेक्षित ही रह जाता है ऐसे में वे आगे चलकर अर्जित संपदा के साथ क्या गुल खिलाएंगे यह चिंता धन के लोभी केसिर को घुन की  तरह हमेशा खाए रहती है |

इस पर यदि किसी भी कीमत पर धन अर्जन का भूत सवार हो जाए तो फिर भ्रष्टाचार की दलदल में धसते देर नहीं लगती, भ्रष्टाचार उजागर ना हो इसका भय अलग से तलवार की तरह सिर पर लटका रहता है और अंततः जीवन का सार तत्व हाथ से फिसलते देख दुख और कष्ट के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता |

त्यागपूर्ण भोग

त्यागपूर्ण भोग करो 100 हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बांटो और ईमानदारी पूर्वक जितना अर्जन होता है उसमें संतुष्ट रहो क्योंकि जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं बहुत सीमित है इनके लिए व्यक्ति को अपनी सुख शांति को दांव पर लगाकर धनकुबेर बनने की आवश्यकता नहीं |

किसी भी कीमत पर नाम कमाने की चाह और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की हवस भी मनुष्य के लिए दुख का कारण बनते हैं, ऐसे में व्यक्ति ओछे एवं हास्य पद हथकंडे अपनाता है | 

जिनको देख व्यक्ति दूसरों की नजर में तो गिरता ही रह अपनी अंतरात्मा से भी कटता जाता है ऐसे में चापलूसी का जमावड़ा भी धीरे-धीरे एकत्रित होता जाता है जो चापलूसी की आड़ में अपना उल्लू सीधा कर रहे होते हैं |

ऐसे में दूसरों को नीचा दिखाने की पर्वतती के स्वभाव का अंग बनती जाती है, दिन-रात व्यक्ति अपनी आंह, पुष्टि, तुष्टएवं प्रतिद्वंदी को नीचा दिखाने की तिगड़म में उलझा रहता है | 

उसके दिन का चैन और रात की नींद नदारद हो जाते हैं जबकि समझदारी भरा कदम होता कि व्यक्ति जो है जैसा है वैसा ही रहे जीवन में मिली अमानतो का आनंद उठाएं सुख और आनंद का आधार अपने कर्तव्य पालन में खोजें जरूरतमंदों की मदद करें और दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करें |

दूसरों से तुलना

दूसरों से तुलना कटाक्ष भी दुःख का एक बड़ा कारण बनता है उसकी कमीज मेरी कमी से सफेद कैसे अपने पड़ोसियों से हर चीज में तुलना अनावश्यक तनाव एवं दुख का कारण बनते हैं | 

विचार किया होता तो समझ आता कि शायद पड़ोसी इन सब की पात्रता रखता है उसने कठोर श्रम, संघर्ष एवं त्याग द्वारा इसे अर्जित किया है, यह सब उसके स्वरचित पूर्ण का फल है | 

उस से प्रेरित होकर हम भी वैसा ही प्रयास करते हो सकता है कि पड़ोसी का सारा वैभव एवं रौबदार भ्रष्टाचार पर आधारित ऐसे में उस से तुलना करना तो बेमानी होगी अपनी मेहनत की सूखी रोटी दूसरों की चिकनी चुपड़ी रोटी से बेहतर कहावत ही सच्चे सुख का आधार है दूसरों से अनावश्यक तुलना सदा दुख एवं तनाव का कारण बनते हैं |

ईश्वरीय न्याय व्यवस्था में विश्वास का अभाव भी दुख का एक बड़ा कारण बनता है जो कर्म पर सिद्धांत से सीधे जुड़ा हुआ है | इंसान जैसे काम करता है उसको वैसा ही फल मिलता है, अच्छे कर्म करोगे तो अच्छे फल मिलेंगे बुरे कर्म करेगा तो बुरा फल मिलेगा | 

निष्कर्ष

अपने कर्मों के फल से कोई बच नहीं सकता यह समझ व्यक्ति को सदा अच्छे एवं श्रेष्ठ कर्म करने के लिए प्रभात करती है जबकि इस आस्था के अभाव में व्यक्ति निकृष्ट कर्मों में लिप्त होने में संकोच नहीं करता तत्कालिक लाभ या राग में आकर व्यक्ति गलत निर्णय लेता है और जीवन को शांति के सागर की ओर धकेल देता है |

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