समस्या और समाधान - Motivational Story

किसी भी समस्या का जन्म बाद में होता है, जबकि समाधान उससे पूर्व ही विद्वान रहता है | दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान ना हो | कोई ऐसा प्रश्न नहीं जिसका उत्तर ना हो, बस अंतर मात्र इतना है कि वह समाधान उत्तर हमारे संज्ञान में आ सकता कि नहीं आ सकता | यदि आ गया तो हमारी बुद्धि ने उसे स्वीकारा कि नहीं |

समस्या और समाधान - Motivational Story

हमको लगता है कि मंजिलें बाद में तय हुई, उनको प्राप्त करने के मार्ग पहले से ही है बस उन राहों पर सुविधाओं का समायोजन बाद में होता है | 

जैसे श्री बद्रीनाथ जाने के लिए व्यक्ति 2000 साल पहले भी जाते थे, 200 साल पहले भी जाती थी, 20 वर्ष पहले जो लोग गए वह कहते हैं कि अब रास्ते में तथा श्रीधाम में बहुत बदलाव आ गया एक बात याद रखना "राहें बदलती रहती है कभी मंजिले नहीं बदला करती"

राह क्या है?

जहां से चलकर आप गंतव्य तक पहुंचे वही तो रहा है | गंतव्य पाने के लिए आप मानिक पथ का आश्चर्य अथवा स्वयं पथ का निर्माण करें | 

भाई समस्या हमारी सोच के ऊपर मात्र है सकारात्मक सोच हर समस्या में भी समाधान पर चिंतन के कारण आगे बढ़ने के उपाय खोज लेती है जबकि नकारात्मक सोच समाधान की पलों को भी समस्या परक चिंतन के कारण जटिल बना देती है |

किसी भी व्यक्ति को वस्तु को, स्थान को, स्तिथि को, घटना को, परिणाम को, उसके मौलिक रूप में समझने की कोशिश करें उसे सहजता से लें और तदनु रूप व्यवहार करें तो समस्या आ ही नहीं सकती |

बिच्छू या सांप को उनके स्वभाव रूप समझकर आत्म रक्षा के उपयोग पर विचार करें ना कि उनके जहरीले तथा दुख देने की प्रवृत्ति पर ही अटके रहे |

कुत्ता, घोड़ा, गधा, सिंह, हाथी, आदि प्राणियों की प्रवृत्ति समझने में आ गई तो आपको कभी किसी से गिला शिकवा ना रहेगा |

अर्थात मनुष्यों में भी कम अथवा अधिक मात्रा में जन्मातरिया संस्कारवश यह पशुत्वा के गुण छिपे रहते हैं कभी उनकी झलक चेहरे से दिखती है | 

समस्या और समाधान

कभी चेष्टा से कभी व्यवहार से कभी प्रवत्ति से, जो जिस प्रवृत्ति का है उनको सहजता मे ले स्वयं का बचाव करके ही समाज का उपकार किया जा सकता है | 

जो स्वयं तैरकर प्राण बचाने की क्षमता रखता है वही दूसरों की जान भी बचा सकता है | जो बेचारा स्वयं तैरने मे  सक्षम नहीं है वह डूबते हुए को बचाने के लिए शोर मचा सकता है परंतु स्वयं नहीं बचा सकता |

किसी भी परिस्थिति को देखकर उधगीन हो जाना, खिन हो जाना, बिखर जाना, हताश हो जाना, क्रोध में वह जाना रोने लगना, समस्या है और शांत गंभीर होकर कारण की तह में जाकर उपाय सोचना आगे बढ़ जाना ही समाधान है |

जितना भी दुनिया में दुर्घटना होती है आप गंभीरता से विचार करें तो पाएंगे कि यह सब व्यर्थ की अफवाह से ही उठी हताश वश सिर पर पांव रखकर मची भगदड़ के कारण होती हैं |

उदाहरण

मेरठ के उपहार सिनेमा हॉल में आग लगी किसी भी भले इंसान ने साहस करके कनेक्शन काटने की बात ना सोची  बस आग लग गई, मर गई हाय हाय करना रोना चीखना चिल्लाना और यही हुआ आग लगने से दो चार मरते भगदड़ में सैकड़ों मरे गए बेचारे सब शांत रहते कोई समझदार बिजली कनेक्शन काट देता लगी आग को बुझाता तब यह घटना इतनी विकराल ना होती |

कुंभ मेले की दशा हमारी आंखों देखी है बिना किसी कारण के अफवाहवश यह सुनकर कि पुल टूट गया उल्टे भागने लगे जबकि पुलकि दो रेलिंग ही टूटी थी उस भगदड़ में 50 लोग काल के गाल में समा गए |

हमारी जीवन जीने की दशा गलत हो गई है हमने मृत्यु को बहुत महत्व दे दिया है | जीवन की उपेक्षा करके मृत्यु के भय का ऐसा असर है कि व्यक्ति अकेलेपन से अंधेरे से अनजाने लोगों से डरने लगा है |

अपने आप से डरने लगा है जबकि मृत्यु तो जीवन परिवर्तन का एक अपरिहये संस्कार है | आज तक कोई ना डाल सका और कोई टाल भी ना सकेगा जो मृत्यु का स्वागत करने को संनद है वही जिंदगी का स्वाद ले सकता है वही जीवन को सफल बना सकता है |

समस्या ही समाधान

मृत्यु, अपमान, पराजय, हानि, शत्रु, अंधकार, और पतझड़ यह सब ही जीवन, सम्मान, विजय, लाभ, यश, सुख, मित्र , प्रकाश तथा बसंत की आधारभूमि हैं इनके बिना संस्कार की कल्पना ही संभव नहीं है |

मात्र रसगुल्ला से काम न चलेगा जीवन मे करेला भी बहुत उपयोगी है | करेले की करवाहट मे रसगुल्ले की मिठास के दोषो को शमन करने की क्षमता है |

जब व्यक्ति सम्मानदिकी की मिठास का स्वाद लेने से मदमस्त होकर मनोरोगी तथा अभिमानी हो जाता है पैर जमीन पर नहीं पड़ते तब भगवान अपमानदीकी कड़वाहट घोल कर इंसान को यथार्थ की खुरदरी जमीन पर खड़ा कर देता है|

बुद्धिमान व्यक्ति जहां पानी का रिसाव है वही टापिग करता है दूसरी जगह शोर नहीं मचाता जहां से समस्या का उदय है वही समाधान करें किसी अन्य के अपराध को दोष को, कहीं दूसरे के सामने कहना ना समझी है |

जिसकी गलती है उसी को एकांत में समझाने से समाधान की संभावना है, अन्यत्र कहने से तो बात बिगड़ने की ही संभावना बढ़ती है |

निष्कर्ष

समस्या और समाधान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बहुत गरीब है दोनों के बीच बहुत जीना सा पर्दा है | हमारे नजरिए पर निर्भर करता है कि हम किस व्यक्ति, वस्तु, स्थान, घटना, को किस रूप में लेते हैं | 

हमारी समझने से समस्या कुछ है ही नहीं सिर्फ हमारी समझ का फर्क है उलझने में हमारा मन तथा मस्तिक्ष होता है और हम उसे समाज के माथे मढ़ देते हैं |

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