सब नाम रूपों मे एक ही भगवान | Motivation

भारतीय संस्कृति में सबसे मुख्य भेद माने जाते हैं वे अपौरुषेय है, अनादि है और सदा रहने वाले नित्य है | उनमे तीन काण्ड माने जाते है | उन्ही तीनों का विशद एवं विस्तृत वर्णन पुराण और इतिहास ग्रंथो मे मिलता है जिनकी रचना सुन्दर सुन्दर कथाओ के द्वारा सर्व साधारण जनता को गंभीर विषय सरलता से समझाने के लिये श्री ब्यास देव ने कृपापूर्वक की है |

ऐसे तो पुराण भी अनादि ही माने जाते है पर इनका समय समय पर जीड़ाधार होता रहा | पुराणों में ही लेख मिलता है कि इनका कलेवर बहुत बड़ा था उनको अल्पायु कलि युगी जीवो के लिए संक्षिप्त रूप से बनाया गया है | इनमें सांसारिक तथा पारमार्थिक सर्वापयोगी सर्व विषयों का बड़ा अच्छा वर्णन किया गया है| 

सब नाम रूपों मे एक ही भगवान  Motivation

पढ़ने से मालूम होता है कि इनमें दैवी संपत्ति, आसुरी संपति, तीर्थ, व्रत, उपवास, ज्यज्ञ, दान, तप, संयम, सेवा, आश्रम धर्म, वर्ण धर्म, स्त्री धर्म,  सामान्य धर्म, राज्यधर्म, प्रजा धर्म, जाति, देश, काल, समय, संबंध, परिस्थिति, आदि को लेकर अवश्य कर्तव्य कर्म आदि विषयों का गूढ़ आशय सहित विचित्र ढंग से वर्णन हुआ है |

साधारण रीती से देखने पर परस्पर बड़ा विरोध सा मालूम देता है, जिनका हम जैसे साधारण मनुष्यों के द्वारा तो समाधान करना भी कठिन हो जाता है क्योंकि जब जहां जिस तीर्थ व्रत आदि की महिमा का वर्णन करने लगते हैं तो उसी को सर्व परी बतला दिया जाता है|

श्री गंगा जी की महिमा

जैसे श्री गंगा जी की महिमा कही तो कहा इसके समान न सरयू है ना तो पुष्कर है ना यमुना है ना तीर्थराज प्रयाग ही है और तीर्थराज का वर्णन करने लगे तो कहा कि इसके सामान और कोई तीर्थ ही नहीं है यह एक संपूर्ण तीर्थों का राजा है | 

काशी माहात्म्यमे आया है कि इस मोक्षदयिनी पुरीके समान तीर्थ इस त्रिलोकी मे कोई नहीं है क्योकि यह भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी हुई है | ऐसे ही कार्तिक माहात्म्यम वैशाख माहात्म्यम मार्गशीर्ष माहात्म्यम एवं एकादशी आदि व्रतों के विषय में कथन है कहीं-कहीं ऐसा कहा है कि तीर्थ यात्रा का फल साधारण है | 

व्रत का विशेष व्रत से इन्द्रियसयम का और इन्द्रियसंयम से भजन भगतचिन्तन का और अधिक एवं भगवत्प्रेम का उससे भी अत्यधिक है | इसका समाधान मेरी धारणा मे यह है कि पूर्व का वर्णन निष्ठाकी द्रष्टि से है और दूसरा वर्णन वस्तु तत्त्व द्रष्टि से है अतः इसमें कोई विरोध नहीं है | 

सब नाम रूपों मे एक ही भगवान

निष्ठा का तात्पर्य है एक मनुष्य विशेष की किसी इस्टा पर ह्दय की द्रण धारणा उस धारणा को अत्यधिक द्रण करने के लिये ही पहला वर्णन है इससे ह्रदय प्रधान साधक की व्रतति सब ओर से हट  कर एक इस्ट मे लग जाती है और उसी मे सर्वा परि अनन्य भावना हो जाती है | 

ऐसा होने से जब सर्वा परि परमात्मा प्रकट हो जाते है तब या तो उसे सब यथार्थ तत्व भगवान समझा देते है या उसके स्वयं समझ मे आ जाता है फिर उसके लिये कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता वह कृत कृत्य हो जाता है |

दूसरे प्रकार का वर्णन बुद्धि प्रधान तर्कशील मनुष्यो के लिये है उस पर विशवास करके चलने वाला क्रमश एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे साधन द्वारा यथास्थिति मे पहुँच जायेगा यदि तारत्म्यताके विवेक द्वारा निःसंदिग्द होकर तेजी से चलता रहेगा तो वह क्रमश श्रेढियों को पार करता हुआ उस पार पहुँच कर सदा के लिये कृतकृत्य हो जायगा | 

श्री परमात्मा एक है

सिध्दान्तता बात यह है कि श्री परमात्मा एक है वे ही अनेक जगह अनेक नामो से कहे गये है वे अनेक जगह अनेक रूपों मे रहते हुए भी हरेक जगह पूर्ण रूप से ही विराजमान है | जो उनको जिस भाव से जिस रूप मे जिस प्रकार चाहता हैं वह वैसे ही उनको प्राप्त कर लेता है क्योंकि वे भी उसे वैसे ही चाहते है | 

अतः कोई चाहे किसी भी रीति से उनको भजे यदि आजतक किसी ने भी जिस प्रकार से उपासना न की हो ऐसे किसी नये ढंग की उपासना भी कोई करे तो भी प्रेम की पूर्णता होने पर उसे परमात्मा की प्राप्ति अवश्य होगी क्योंकि वह एकमात्र अपने प्रियतम परमात्मा को चाहता है उनके लिये जो कनक कामिनी आराम मान सत्कार कीर्ति आदि लोक और परलोक की भोग सामग्रियों का त्याग करता है | 

किसी भी नाशवान पदार्थ को नहीं चाहता सच्ची हार्दिक लगन से सर्वोत्तम परम पुरुष पुरुषोतम भगवान को चाहता है ऐसे साधक से बिना मिले वे कैसे रह सकते है |

निष्कर्ष

कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तत्व को मनुष्य सर्वश्रेष्ठ सर्वा परि सर्वथा पूर्ण ईमानदारी के साथ मानता है उसका वह चाहे कैसा भी नाम रूप क्यों न मानता हो चाहे किसी भी प्रकार विशेष से उसकी सेवा पूजा उपासना क्यों न करता हो भगवान उसको अपनी ही उपासना सेवा और पूजा मानते है क्योंकि सर्वा परि तत्व एक है और वही भगवान है | 

साधक की समझ मे भूल हो सकती है परंतु भगवान के यहाँ तो भूल नहीं होती ये एक मात्र भावको ही देखते है अतः श्रद्धालु साधको को चाहिये कि भगवान के किसी भी रूप और नाम पर पूर्ण विशवास करके अनन्य प्रेम पूर्वक उनका स्मरण करता रहे किसी भी अवस्था मे उनको भूले नहीं 

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