बाहर की दौड़ मे जीवन का उदेश्श्य न भूल बैठे हम - निबंध

मानवीय स्वभाव है कि हम आंकड़ों के स्थान पर घटनाक्रमों की भाषा को बेहतर समझते हैं, इसलिए बच्चों को गणित के स्थान पर कहानियां सिखा समझा पाना ज्यादा आसान होता है | इन्ही मे से कुछ कहानियां आगे चलकर सिद्धांतों का रूप ले लेती हैं | 

बाहर की दौड़ मे जीवन का उदेश्श्य न भूल बैठे हम - निबंध

सिद्धांत धीरे-धीरे योजनाओं में बदल जाते हैं और एक दिन वो योजनाएं भी कार्य रूप में परिणत हो जाती है | यदि विगत सदी के समस्त घटनाक्रमों को एक दर्शनिक दृष्टि से नजर दौड़ा कर देखें, तो हम पाएंगे कि विगत सदी में मानवता के सम्मुख मुलरूपेण तीन तरह की कहानियां आई है इन्हीं कहानियों को हम तीन सिद्धांत या तीन  मान्यताओं के नाम से भी पुकार सकते हैं | 

इनमे से पहली मान्यता कट्टरपंथी सोच के रूप में थी, जिसे विश्व भर में नाजीवाद या फॉसिजम के नाम से जाना जाता है | 

बाहर की दौड़ मे जीवन का उदेश्श्य न भूल बैठे हम

पिछली सदी की शुरुआती वर्षों में लगभग हर राष्ट्र इसी चिंता के आगोश में सांसे लेता दिखाई पड़ता था | जर्मनी,  इटली, जापान की स्थिति मान्यता को द्वितीय विश्व युद्ध ने लगभग पूर्णरूपेण नकार दिया गया एवं जापान कको,  हिरोशिमा, और नागासाकी जैसे लोमहर्षक कांडो का साक्षी बनना पड़ा | 

स्पष्ट था कि वैशविक समुदाय नाजीवादी या फासिज्म से स्वयं को दूर रखना चाहता है | द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संपूर्ण विश्व दो प्रकार की सोचो या मान्यताओं में तब्दील हो गई |

पहली मान्यता मार्क्सवाद या कम्युनिज्म की थी | रूस, चीन, उत्तरी कोरिया से लेकर आधी दुनिया उस सोच को मानती दिखी और दूसरी मान्यता उदारवादी सोच या लिबरलिज़्म की थी | अमेरिका, यूरोप, से लेकर अनेक देश इन मान्यता को अपनाते दिखे |

हर सिद्धांत एक दिन नई सोच से चुनौती पाता है, सोवियत संघ के विघटन एवं जर्मनी की दीवार के गिरने के साथ ही कम्युनिजम की नीव भी कपकपायी, तो वही वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले ने एवं सन 2008 मे अत्यंत उद्दारपंती सोच के कारण आए वैश्विक अर्थ संकट ने लोगों का विश्वास लिबरजियम से भी हटा दिया |

आज संपूर्ण समाज एक भ्र्म और भांति के कगार पर खड़ा प्रतीत होता है, इसलिए जहाँ अमेरिका के इमीग्रेशन को रोकने के लिए कट्टरपंथी सोच पर पनपती दिखाई देती है, तो वही यूनाइटेड किंगडम ने स्वयं को यूरोपियन यूनियन से बाहर निकालने के लिए वोट करके एक अत्यंत दुविधापूर्ण परीस्थिति स्थापित कर दी है |

सारांश में कहे तो द्वितीय विश्व युद्ध से पहले मनुष्य जाति के पास तीन विकल्प थे, सोवियत संघ के विघटन से पहले दो अर्थ संकट आने से पहले एक और आज की तारीख में विकल्प शून्यता की स्थिति है | 

यह कहना अतिशयोक्ति ना होगा कि ऐसी परिस्थितियां ऋषि पूर्ण घटनाक्रमों को दुविधा को भ्रम को तनाव को और संघर्ष को जन्म देती हैं जैसे आज कदम कदम पर होता दिखाई पड़ता है |

आज की परिस्थितियों में वैश्विक सर्व संपत्ति के अभाव के अतिरिक्त जो एक और चुनौती वैश्विक पटल पर उभरती नजर आती है, वह चुनौती तकनीकी के तीव्रतम विकास की है | 

इंटरनेट

इस तेजी के साथ विगत दिनों कंप्यूटर, डिजिटल वर्ल्ड, इंटरनेट इत्यादि की परिस्थिति हमारी दैनिक दिनचर्या में स्थान बना कर बैठ गई है, उसका अनुमान लगा पाना भी आज से 50 वर्ष पूर्व तनिक भी संभव ना था |

मजेदार बात यह है कि हमारे जीवन में ज्यादातर आते परिवर्तनों के लिए हम हमारा मत व्यक्त करने का अधिकार मिला हुआ है, हम कौन सी सरकार चाहते हैं, बैंक कौन सा उपयोग करना से लेकर ट्रेन की बोगी चुनने का अधिकार हमारे पास है | 

तुरंत इंटरनेट पर आते चीन से लेकर खरीदारी की व्यवस्था तक में हमारा योगदान शून्य के करीब है | क्या हमने इंटरनेट के लिए वोट डाले थे, क्या प्रत्येक वर्ष बाजार में आने वाले स्मार्टफोन की श्रृंखला हमसे पूछ कर आती है |

तकनीकी कि यह क्रांति जो आज माननीय समुदाय पर अपना प्रभुत्व स्थापित करती दिखाई पड़ती है, इसके परिणाम आज भी हमारी आंखों के सामने हैं | कंप्यूटर एल्गोरिथ्म के कारण अर्थशास्त्र पहले ही इतना जटिल हो गया है कि आज हर व्यक्ति के लिए उसे समझ पाना संभव नहीं है | 

क्रिप्टो करेंसी

क्रिप्टो करेंसी बिटकॉइन, ब्लैकचेन, इत्यादि के आ जाने से धीरे-धीरे जब कैश या नगदी मुद्रा पूर्णरूपेण समाप्त हो चलेगी तब मुद्रा कर लगाना लगभग अप्रसांगिक हो जाएगा और ऐसे में राजनीतिक दृष्टि से सोचना जरूरी हो जाएगा कि वह अपने कोष के संग्रह के लिए किन मार्गों को तलाशे | 

इसके साथ जो एक और चुनौती है वह माननीय उद्देश्य को लेकर उभरती है, धीरे-धीरे विश्व के साथ लगभग हर पहलू एवं आयाम पर हमारा अधिकार एवं नियंत्रण स्थापित होता जा रहा है परंतु क्या हम अपने मन पर नियंत्रण स्थापित कर आए हैं | 

बाहर की जगह पर आधिपत्य तो हम करते दिखाई पड़ते हैं, पर आत्मिक जगत पर हमारा नियंत्रण ना के बराबर है | हम नदियां रोकना व बांध बनाना जानते हैं पर मन भावनाओं व विचारों पर हमारा नियंत्रण लगभग ना के बराबर रहा है | बायोटेक व इन्फोटेक की क्रांति जो विगत दिनों घटी है जब भी हमें हमारे आंतरिक जगत का प्रभुत्व प्रदान करने लगेगी तब क्या होगा यह प्रश्न विचारणीय है |

औद्योगिकरण

उदाहरण के तौर पर जब औद्योगिकरण हुआ तब हम उन्माद की उस दौर में कूद पड़े और जब तक हम यह जान पाते कि ऐसा करने से पर्यावरण बुरी तरह असंतुलित हो जाएगा तब तक बहुत देर हो चुकी थी | 

विगत सदी की तीन महत्वपूर्ण मान्यताओं के अंत के बाद तकनीकी कारण इस सदी के मुख्य किरदार की भूमिका में उतरा है और इसका परिणाम क्या होगा यह जान पाना अभी हमारे लिए संभव नहीं है परंतु जो परिवर्तन आज की तारीख में दिख रहे हैं उन्हें शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता |

ऐसा इसलिए कि इन्फोटेक और बायोटेक की क्रांतिया ऐसे लोगों के द्वारा लाई जा रही है जो ना तो इनकी खोजों के राजनीतिक परिणामों के प्रति सचेत हैं और ना ही किसी देश और वर्ग की सोच का प्रतिनिधित्व करते दिखाई पड़ते हैं, इसलिए धीरे-धीरे जो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है |

निष्कर्ष

वह यह कि एक आम इंसान अपने आपको उन क्रांतियों के संदर्भ में अप्रासंगिक मानने लगा है चाहे सोचना नाजीवादी की रही हो या समाजवादी कि पूंजीवाद की रही हो या उदारवाद की इनमें से प्रत्येक सोच के पीछे कम से कम वैयकिक के प्रतिनिधितत्व का भाव तो था |

व्यक्ति को इन सिद्धांतों को कार्य रूप में परिणत करने में उसकी भूमिका तो है पर आज जेनेटिक इंजीनियरिंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नामों के बीच में एक आम आदमी अपने परिचय को मोहताज नजर आता है |

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