औषधियो में नहीं है स्वस्थ जीवन का सूत्र - निबंध

मानव की स्वस्थ रहने की चेष्टा आज की नहीं अपितु प्राचीन काल से चली आ रही है और यह चेष्टा संभवतः आगे भी चलती रहेगी | यह देखकर बहुत आश्चर्य होता है कि हम अपने स्वयं के शरीर को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़कर स्वयं इसके लिए कुछ भी नहीं करके पूर्णतः दुसरो पर आशिक हो जाते हैं तथा अपने दायित्व उन लोगों को हस्तांतरित कर देते हैं जो रोग के निदान के लिए औषधियों एवं शल्य चिकित्सा का सहारा लेकर उसे निरोगी बनाने का आश्वासन देते हैं | 

औषधियो में नहीं है स्वस्थ जीवन का सूत्र - निबंध

मानव शरीर को स्वस्थ रखने के लिए एलोपैथी, यूनानी, प्राकृतिक, आयुर्वेद, योग, होम्योपैथी मेगनेटिक, विचार चिकित्सा, हिपनोजियम, रैकी एक्यूप्रेशर, एवं पिरामिड पावर चिकित्सा, आदि पद्धतियां वर्तमान में उपयोग में आ रही है |  

यह सभी पद्धतियां अपने-अपने तरीकों से मानव शरीर को निरोगी करने का दावा करती हैं | आज के युग में जब औषधि विज्ञान चरम सीमा पर पहुंच चुका है लोगों की संख्या में भी निरंतर बढ़ोतरी तथा जनमानस का गिरता स्वास्थय इस बात की ओर संकेत करता है कि क्यों नहीं हम एक ऐसी पद्धतियों को विकसित करें जिससे समस्त रोगों से छुटकारा पाकर हम अपना बचाव करते हुए स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सकें | 

औषधियो में नहीं है स्वस्थ जीवन का सूत्र

वालतेयर ने कहा है चिकित्सक जो औषधियां उपचार के लिए देते हैं उनके उपयोग के बारे में वे स्वयं कम जानते हैं | जिन रोगो के बारे में औषधियां दी जाती हैं उनके बारे में बहुत ही कम जानते हैं तथा जिन जिन व्यक्तियों को यह औषधियां दी जाती है उनके बारे में भी कुछ भी नहीं जानते है | 

ओलिवर वेंडेल होमने ने कहा है अगर औषधि विज्ञान की पूरी पुस्तकें समुद्र में फेंक दी जाए तो जनमानस के लिये बहुत अच्छा होगा | 

हाल ही में नारमन कांजिनसेने एक बहुत चर्चित पुस्तक ऐनाटोमी ऑफ इलनेस मे लिखा है कि मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों और कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी हम चिकित्सकों का आदर करते रहे हैं जबकि वह खतरनाक एवं बेकार औषद्यि देते हैं | 

फारमोकोलॉजी शब्द ग्रीक भाषा के शब्द में पॉइजन से ही निकला है यह विचारणीय बिंदु है कि विष से कैसे बचा जाए अर्थात औषधियों के प्रयोग के बिना हम कैसे स्वस्थ रहें और किस प्रकार अपने शरीर को स्वस्थ रखते हुए जीवन का पूर्ण आनंद उठाये | 

आज के वैज्ञानिक युग में यह भी आवश्यक है कि हम एक ऐसी राह अपनाये जिससे किसी चिकित्सक के पास जाए बिना और बिना किसी औषधि का सेवन किये तथा बिना चीरफाड़की जरूरत का सहारा लिए ही मात्र रोकथाम से ही अपने शरीर को पूरी तरह से स्वस्थ रख सकें | 

हम बीमार क्यों पड़ते हैं?

अधिकतर बीमारियों का कारण दूषित वातावरण एवं प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करना होता है ना कि शारीरिक कमियां जानबूझकर अथवा अनजाने में | हम हर समय दूषित वातावरण के प्रभाव में रहते हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और जैसे हम हर समय किसी न किसी रूप में जीवाणुओं और कीटाणुओं में से संक्रमित सूर्य की रोशनी भोजन पानी और वायु का सेवन करते हैं यहां तक कि कुछ जीवाणुओं के लिए तो हमारा शरीर एक फूडबैंक बन जाता है और भी इस पर ही पलते हैं

सामान्यता हम रोगो  के दुष्प्रभावों को ही देखते हैं परंतु दुष्प्रभावों से बचने के उपयोगों की ओर पूरा ध्यान नहीं देते हैं रोग एवं स्वास्थ्य दोनों शरीर के संतुलन पर निर्भर करते हैं संतुलन की दशा में इनका शरीर पर प्रभाव लाभदायक और असंतुलन की दशा में हानिकारक होता है |

आदि काल से ही भारत वासी सूर्य के प्रकाश को स्वास्थ्यवर्धक एवं रोग नाशक शक्ति के रूप में  मानते आए हैं सूर्य रशिमयो  के दैनिक प्रयोग से मनुष्य का पित्त  एवं वायु से उत्पन्न सभी रोगों से मुक्त होकर 100 वर्ष पयरन्ता  जीवित रह सकता है उसमें भी सूर्य की प्रातः कालीन किरणे अत्यधिक उपयोगी होती हैं | 

मानव शरीर में लगभग दो-तिहाई मात्रा जल  की होती है | जल की मात्रा को बनाए रखने के लिए ८ से १०  गिलास पानी रोज पीना हितकर होता है | मुख्य: बुजुर्गो को तो बिना पियास के ८ से १० गिलास पानी रोज पीना चाहिए क्योंकि वृद्धावस्था में प्यास कम लगती है, लेकिन जल की आवश्यकता तो बनी ही रहती है | 

जापान के सिकनेस संस्था ने हाल ही में आम जनता के लिए एक बुलेटिन जारी कर यह बताया है कि जिन असामान्य बीमारियों का निदान अभी तक संभव नहीं हो पाया है उन्हें जल चिकित्सा से ठीक किया जा सकता है|

यह एक बहुत ही सरल सुविधाजनक तथा बिना व्यय कि चिकित्सा है इसमें प्रातः उठते ही ३ गिलास पानी पीना होता है | जिससे कब्ज  जैसे रोग तो कुछ दिनों में एवं दूसरे रोग  कुछ समय में ठीक हो जाते हैं |

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